शुक्रवार, 18 सितंबर 2009

कौन है मौत का सौदागर .......


मेत्रोपोलीओन मर्जिस्त्रेट तमांग कि इशरत जहान एन्कोउन्टर पर आई रिपोर्ट पर अहमदाबाद हाई कोर्ट का स्टे आर्डर क्या न्यायपूर्ण है ? और सोचने वाली बात है कि अगर स्टे आर्डर नही लगता तो क्या हो जाता ?

शायद माँ को इन्साफ मिल जाता और मोदी सरकार की पुरे भारत मई खिचाई हो जाती । मेरे मन में एक और सवाल आया की बेशक एक पीड़ित माँ को न्याय न मिले मगर मोदी सरकार की झूठी शान में जरा भी कमी नही आनी चाहिए हे न ?

तो सुनिए मोदी के वफादारो की कहानी जिन्होंने एक नाबालिक लड़की इशरत जहान समेत ३ लोगो को मुंबई से किडनेप किया और गुजरात पुलिस की क्राईम ब्रांच के बहादुर सिपाहियों ने इशरत समेत तीनो का अहमदाबाद एन्कोउन्टर कर साबित कर दिया के वो की वो मोदी से मोमी पाने के पुरे हक़दार हैं ।

सवाल ये भी है की गुजरात में भला ऐसे क्यों से दंगे भड़क उठते या आख़िर कौन सा राज्यद्रोह हो जाता अगर जस्टिस तमांग की रिपोर्ट पब्लिक हो जाती ।

और इस देश की मीडिया के तो क्या कहने हें जनाब जो एक बार सरकार ने कहा सो पत्थर की लकीर और तुंरत बड़े बड़े पत्रकारओ ने इशरत को एक आतंकवादी साबित करने में एक पल भी जाया न होने दिया बिना असलियत को जाने ।

खैर अब इशरत की माँ सुप्रीम कोर्ट केचक्कर काट रही है क्योंकि सिय आर्डर की मियाद ०९ सितम्बर को ही खत्तम हो चुकी थी लेकिन न तो सुप्रीम कोर्ट और न ही गुजरात हाई कोर्ट का कोई फ़ैसला इस पर सामने आया है ।

इस देश में लगातार एक के बाद एक फैक एनकाउंटर की वारदात सामने आ रही है कुछ दिनों पहले मणि पुर में एक स्टुडेंट का एनकाउंटर और उसके बाद बागपत से उतराखंड काम करने के लिए गए लड़के का पुलिस द्वअर एनकाउंटर और रोज़ न जाने कितने फैक एनकाउंटर हैं जो मीडिया में जगह नही बना पाते अनपे पीछे इन्साफ liye हजारो सवालिया निशाँ छोड़ जाते है । सवाल छोड़ के में भी जा रहा हूँ की फैक एनकाउंटर, जांच और इन्साफ का नाटक और कितना ? और कितना ?

मंगलवार, 15 सितंबर 2009

बात निकली तो दूर तलक तक जाएगी



ये डर और डेयर कि जंग नही बल्कि लडा़इ है पैसा कमाने कीकलर टीवी पर आने वाला खिलाडी अक्षय कुमार का नया शो जिसमें लडकियां कपडे तो पहनती हैं मगर उतारने के लिए । स्टंट करते समय ढीले कपड़े पहनना तो समझ में आता है मगर खेल के नाम पर आघी नंगी लडकियों को परोसना भला कौन से खेल की मांग है । स्वाल यह उठता है कि कलर टीवी टीआरपी की दौड में बने रहने के लिए किस हद तक जा सकता है ।शायद कसूर वार भाग लेने वाले प्रतियोगी भी उतने ही है जो पैसों के लालच मे शायद किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार रहते हैं और थोडा बहुत कसूर दर्शकों का भेी है जो शायद ही कभी अपनी आवाज या विरोघ चैनल तक पहुंचाते होंगे । कभी कभी लगता है कि दर्शक की आंख चुराने की ये कोशिश प्रसारण को और किस हद तक ले जाएगी ।रखी का स्वंयवर हो या बिग बॉस कि गाली गलोच या फिर बाढ की तरह फेलते जा रहे रोज नये रियलटी शो में रियलटी कम धोखा ज्यादा परोसा जाता है । एक शो का विजेता अगले शो में फिर से प्रतियोगी के भेष में नजर आता है और फिर अगले शो में वही मतलब घूम फिर के वही लोग, वही कैरकटर वही तमाशा वही नाच गाना वही आपसी झगडा वही फुहड टिप्पणी वही एक जैसा मंच मतलब और आखिर में वही दरीयादिल दर्शक जो हमेशाआंखें फाड़े बस वही रिपीटड शो देखने के आदि हो गये हैं । कभी कभी लगता है कि टीवी शो मादक पदार्थों का काम करते हैं जो एक बार फंस गया तो समझो गया ।ो

सोमवार, 14 सितंबर 2009

हिन्दी का सागर क्यों सिमट रहा है ?


मै किसी सरकारी दफ्तर में गया या अस्पताल में ,

मै किसी रेस्तरां में गया या किसी भी समाज में जब भी हिन्दी भाषा में बात की तो मेंरे मुद्दे को वो इज्जत नही मिली शायद जो मिलनी चाहिए थी , मगर जेसे ही टूटी -फूटी ही सही अंग्रेजी की टांग तोडी तो उत्तर में "साहब "

"सर" जेसी संज्ञाओ से नवाजा गया ।

शायद सभी के साथ ऐसा अनुभव कभी न कभी हुआ होगा ।

आज बुनियादी सवाल ये है कि हिन्दी हमारी राष्ट्र भाषा और कितने दिनों तक बनी रहेगी?

दिल्ली की अदालतों में हिन्दी में बहस की इज्जाजत नही है विधि आयोग का कहना है कि न्यायिक शब्दों का हिन्दी में प्रचलन आम हो चुका है और इनका हिन्दी में अनुवाद करना मुमकिन नही है ।

हम अपने बच्चों को अंग्रेजी स्कूल में पढ़ना चाहते हैं घर-बहार उन्हें केवल अंग्रेजी तोते कि तरह रटाते रहना चाहते हैं ।

आज आम बोल चाल की भाषा से लेकर इन्टरनेट तक में अंग्रेजी का वर्चस्व साफ़ झलकता है । माना कि दुनिया के साथ कदम ताल करने के लिए इंग्लिश का चश्मा आँखों पर चढाना बहुत जरुरी है लेकिन अपनी राष्ट्रभाषा का सम्मान करना भी उतना ही जरुरी है ।

अंग्रेजी की जुबान कतरने से अगर झूठे अभिमाम में जीने में मजा आता है तो अपनी राष्ट्रभाषा भी जरा बोल के देखियेगा असली गर्व महसूस होगा ।

गुरुवार, 3 सितंबर 2009


सम्पति का झगडा हर कुचे मे खड़ा ........

दिल्ली हाई कोर्ट ने न्याय ,न्यायालय और न्यायधीश मे किया सही फर्क ......

सी .जे. आई . संवैधानिक पद जरुर हे साथ ही सार्वजनिक ओहदा भी है

जिसे सूचना के आधिकार के दायरे मे आना चाहिए .

दिल्ली हाई कोर्ट के जज रविन्द्र भट्ट ने इस फैसले को सुना कर न्याय , न्यायधीश और न्यायालय मे पारदर्शिता की नई मिसाल कायम की जिसका स्वागत करना चाहिए ...