
मै किसी सरकारी दफ्तर में गया या अस्पताल में ,
मै किसी रेस्तरां में गया या किसी भी समाज में जब भी हिन्दी भाषा में बात की तो मेंरे मुद्दे को वो इज्जत नही मिली शायद जो मिलनी चाहिए थी , मगर जेसे ही टूटी -फूटी ही सही अंग्रेजी की टांग तोडी तो उत्तर में "साहब "
"सर" जेसी संज्ञाओ से नवाजा गया ।
शायद सभी के साथ ऐसा अनुभव कभी न कभी हुआ होगा ।
आज बुनियादी सवाल ये है कि हिन्दी हमारी राष्ट्र भाषा और कितने दिनों तक बनी रहेगी?
दिल्ली की अदालतों में हिन्दी में बहस की इज्जाजत नही है विधि आयोग का कहना है कि न्यायिक शब्दों का हिन्दी में प्रचलन आम हो चुका है और इनका हिन्दी में अनुवाद करना मुमकिन नही है ।
हम अपने बच्चों को अंग्रेजी स्कूल में पढ़ना चाहते हैं घर-बहार उन्हें केवल अंग्रेजी तोते कि तरह रटाते रहना चाहते हैं ।
आज आम बोल चाल की भाषा से लेकर इन्टरनेट तक में अंग्रेजी का वर्चस्व साफ़ झलकता है । माना कि दुनिया के साथ कदम ताल करने के लिए इंग्लिश का चश्मा आँखों पर चढाना बहुत जरुरी है लेकिन अपनी राष्ट्रभाषा का सम्मान करना भी उतना ही जरुरी है ।
अंग्रेजी की जुबान कतरने से अगर झूठे अभिमाम में जीने में मजा आता है तो अपनी राष्ट्रभाषा भी जरा बोल के देखियेगा असली गर्व महसूस होगा ।

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